जीवाणु (Bacteria)
- जीवाणु की खोज Bacterial discovery
- जीवाणु की संरचना Structure of bacteria
- जीवाणुओं के प्रकार Types of bacteria
- जीवाणुओं में पोषण Nutrition in bacteria
- जीवाणुओं से लाभ Benefits from bacteria
- जीवाणुओं से हानियाँ Bacteria losses
- जीवाणुओं से होने वाले रोग Bacterial diseases
(1) सर्वप्रथम 1683 में हालैंड के एण्टोनी वान ल्यूवेनहाॅक (Antonie van Leeuwenhoek) ने अपने बनाये हुये सूक्ष्मदर्शी से दांत के खुरचन में जीवाणुओं को देखा तथा इन्हें सूक्ष्मजीव कहा। इसी कारण ल्यूवेनहाॅक को जीवाणु विज्ञान का पिता कहा जाता है।
- जीवाणु की संरचना
जीवाणु एक कोशिकीय, सूक्ष्म, प्रोकैरियोटिक होते हैं। इनमें केन्द्रक तथा लवक का अभाव होता है। द्रव की एक बूंद में 5 करोड़ जीवाणु समा सकते हैं। इनकी आकृति गोलाकार एवं सर्पिली होती है।हिमकरण यंत्र में 10 o'c से 118 o'c तक ठंडा करने पर जीवाणु निष्क्रिय हो जाते हैं।
- जीवाणुओं के प्रकार : जीवाणु निम्न प्रकार के होते हैं
1. दण्डाकार जीवाणु : यह जीवाणु छड़ाकार होते हैं यह तपेदिक एवं इन्फ्लूएंजा में पाए जाते हैं यह निम्न प्रकार के होते हैं - मिक्रोबैसिलस ,डिप्लोबैसिलस ,स्ट्रेप्टोबैसिलस ,स्टेफाइलोबैसिलस
2. गोलाकार जीवाणु :इस प्रकार के जीवाणु गोलाकार आकृति के होते हैं यह निम्न प्रकार के होते हैं - माइक्रोकोकस, डिप्लोकोकस ,स्ट्रेप्टोकोकस ,स्टेफाइलोकोकस ,सारसिना
3. सर्पिलाकार : ये जीवाणु कुंडलित होकर सर्पिलाकार आकृति बना लेते हैं - स्प्रिला
4. कौमाकार : ये जीवाणु कौमाकार आकृति के होते हैं -वाइव्रियो
- जीवाणुओं में पोषण
जीवाणुओं में पोषण की पाँच विधियां है-
1.प्रकाश संश्लेषी: जीवाणु प्रकाश ऊर्जा के उपयोग से अपना भोजन बनाते हैं। इनमें पर्णहरित के स्थान पर जीवाणु पर्णहरित होता है। जैसे क्रोमेटियम, रोडोस्पिरिलम इत्यादि2.रसायन संश्लेषी: अकार्बनिक पदार्थों के आॅक्सीकरण से ऊर्जा प्राप्त करते हैं। जैसे- नाइट्रोमोनास, नाइट्रोबेक्टर, हाइड्रोजनोमोनास इत्यादि।
3.मृतोपजीवी: मृत पडे़ अवशेष से भोजन प्राप्त करते है। जैसे - लेक्टोबेसिलस, एसिटोबेक्टर इत्यादि।
4.सहजीवी: दूसरे जीव के शरीर में रहकर अपना निर्वाहन करते है। जैसे - राइजोबियम
5.परजीवी: दूसरे जीवों पर निर्भर रहते हैं। ये जीवाणु रोग कारक होते हैं।
पाश्चुरीकरण- यह दो प्रकार से किया जाता है-
1.LTLT (Low Temperature Long Time) इस विधि में दूध का 62.8 डिग्री सेल्ससियस ताप पर लगभग 30 मिनट तक गर्म कर शीघ्रता से ठण्डा कर लिया जाता है, जिससे जीवाणु नष्ट हो जाते हैं।
2.HTST (High Temperature Short Time Method) इस विधि में दूध को 71.डिग्री सेल्ससियस ताप पर लगभग 15 सेकेण्ड तक गर्म करके शीघ्रता से ठण्डा कर लिया जाता है, जिससे जीवाणु नष्ट हो जाते हैं।
- लाभदायक जीवाणु का उपयोग
1 जीवाणु भूमि की उर्वरता बढ़ाते हैं।
2 सड़े-गले मृत अवशेषों का क्षय करते हैं।
3 दूध से दही बनाने में जीवाणु (लेक्टोबेसिलस) का महत्वपूर्ण योगदान है।
4 सिरका बनाने में, चाय उद्योग में तथा उद्योग में
5 जूट, पटसन और सन को सड़ा कर रेशा निकालने में
6 औषधि उद्योग में प्रतिजैविक कार्बनिक, कल्चर माध्यम में जीवाणु की किण्वन क्रिया से बनते हैं।
वतावरण में उपस्थित जीवाणु और कवक पृथ्वी पर उपस्थित मृत तथा सड़े-गले जीवों तथा वनस्पतियों का अपमार्जन करके उसमें उपस्थित तत्व को पुनः खाद्य श्रृंखला के उपयोगी बनाते हैं।
कुछ जीवाणु भोजन को विषाक्त बना देते हैं। जैसे - स्टेफाइलोकोकस, क्लोस्ट्रिडियम, बोटूलिनियम आदि।
नाइट्रोजन स्थिरीकरण में जीवाणु का उपयोग
१-कुछ जीवाणु नाइट्रेट, नाइट्राइट व अमोनियम यौगिक को स्वतंत्र नाइट्रोजन में तोड़ कर डिनाइट्रोजनीकरण को बढ़ावा देता है। जैसे - बैसीलस, थायोबैसिलस, माइक्रोकोकस आदि।
२ -एजोटोबैक्टर, एंजोसपाइरिलम तथा क्लोस्ट्रीडियम जीवाणु की कुछ जातियाँ स्वतंत्र रूप से मिट्टी के कणों के बीच स्थित वायु के नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करती है।
३ -एनाबिना तथा नॉनस्टॉक नामक सायनोबैक्टीरिया वायुमंडल की नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करते है।
४ -राइजोबियम तथा ब्रैडीराजोबियम इत्यादि जीवाणु की जातियाँ लैग्यूमिनोसी (मटर कुल) के पौधे की जड़ो में रहती है और वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करती है।
- पादप में जीवाणु जनित रोग
आलू का शैथिल रोग: स्यूडोमानास सोलेनेयिम द्वारा
नींबू का कैंकर रोग: जैन्थोमोनास सिन्ट्री द्वारा
सेब का अग्निरजा: इरबिनिया द्वारा
फलो में क्राउन रोग: एग्रोबैक्ट्रिरियम ट्यूमिफेसियन्स द्वारा
धान का अंगमारी रोग: जैन्थोमोनास ओराइजी द्वारा
गेहूँ का टून्डु रोग: कोरनोबेक्ट्रियम ट्रीटीकी द्वारा




