भारत और बाहरी दुनिया
आठवीं सदी के बाद
एशिया और यूरोप में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। इन परिवर्तनों के फलस्वरूप न केवल
एशिया और यूरोप के संबंधों में बदलाव आया, बल्कि लोगों के चिंतन और जीवन पद्धतिः
पर भी इनका दूरगामी प्रभाव पड़ा। इन परिपर्तनों का परोक्ष भारत पर भी पड़ा,
क्योंकि पुराने रोम साम्राज्य के साथ भारत का बड़े पैमाने पर व्यापार चलता था।
यूरोप
यूरोप में छठी सदी
के तीसरे चरण के अंत तक दुर्धर्ष रोम साम्राज्य दो हिस्सों में बँट चुका था। रूस
और जर्मनी से आने वाली स्लाव तथा जर्मन जनजातियों ने उसके पश्चिमी हिस्से की
(जिसकी राजधानी अब भी रोम थी) ईंट से ईंट बजा दी थी। ये लोग एक के बाद एक करके कई
समूहों में पुराने राम आए और यहाँ के साम्राज्य पर छा गए। उन्होंने यहाँ भयंकर
जन-संहार किया और लूट-खसोट मचाई। लेकिन कालांतर में ये लोग यूरोप के कई हिस्सों
में स्थाई तौर पर बस गए, जिससे वहाँ की आवादी के स्वरूप तथा भाषा और शासन
पद्धतियों में भारी बदलाद आए। इस काल में स्थानीय आबादी के साथ इन जनजातियों के
मिश्रण के फलस्वरूप, आधुनिक यूरोप के अनेक राष्ट्रों की नींव तैयार हुई। पुराने
रोम साम्राज्य के पूर्वी हिस्से की राजधानी कुस्तुन्तुनिया (इस्तंबोल) थी।
साम्राज्य के इस हिस्से में अधिकांश पूर्वी यूरोप और साथ ही तुर्की, सीरिया और
उत्तर अफ्रीका शामिल थे। इसे बैजंतिया साम्राज्य कहा जाता था। इसने रोम साम्राज्य
की कई परंपराओं को पूर्ववतजारी रखा जैसे सशक्त राजतंत्र और केंद्रीकृत प्रशासना
लेकिन धार्मिक विश्वास तथा नियम-अनुष्ठानों के मामले में यह पश्चिम के कैथलिक
गिरजा संगठन (चर्च) से, जिसका मुखयालय रोम में था, कई मायनों में भिन्न था। पूर्वी
हिस्से में गिरजा संगठन को यूनानी रूढिवादी गिरजा संगठन (ग्रीक ऑर्थोडाक्स चर्च)
कहा जाता था। इसी संगठन तथा बैजंतिया शासकों के प्रयत्नों से रूस को ईसाई धर्म में
दीक्षित किया जा सकाय़ आधुनिक तुर्की और सीरिया भीं, जो बैजंतिया साम्राज्य के अंग
थे, यूनानी रूढिवादी गिरजा संगठन के ही अनुयाई थे। बैजंतिया साम्राज्य एक विशाल और
समृद्ध साम्राज्य था जो पश्चिम में रोम साम्राज्य के पतन के बाद भी एशिया के साथ
व्यापार करता रहा। उसने शासन और संस्कृति की कुछ ऐसी परंपराओं का सूत्रपात किया
जिन्हें सीरिया और मिश्र को जीतने के बाद अरबों ने भी अपनी व्यवस्था में शामिल कर
लिया। उसने यूनान-रोम सभ्यता तथा अरब संसार के बीच सेतु का काम किया और आगे चल कर
पश्चिमी दुनिया में यूनानी ज्ञान-विज्ञान को पुनरूज्जीवित करने में कहायता दी आखिर
पंद्रहवीं सदी के मध्य में जब तुर्की ने कुस्तुनतुनिया को जीत लिया तो इस
साम्राज्य का अवसान हो गया।
पश्चिम में रोम साम्राज्य के
पतन के बाद कई सर्दियों के लिए पश्चिमी यूरोप में नगरों का अस्तित्व लगभग समाप्त
हो गया और विदेशव्य तथा आंतरिक वाणिज्य को गहरा धक्का लगा। इतीहासकार पश्चिमी
यूरोप के इस काल को अंधयुग (डार्क एजं) कहते हैं। परंतु दसवी सदी से व्यापार और
उसके साथ ही शहरी जीवन का भी पुनरूत्थान आरंभ हुआ। बारहवीं और चौदहवीं सदी के बीज
पश्चिमी यूरोप एक बार फिर समृधि के ऊंचे शिखर पर जा पहुंचा। इस काल की एक
उल्लेखनीय विशेषता विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी का उत्कर्ष थी। साथ ही शहरों की तेजी
से विकास हुआ और कई नगरों में जैसे इटली में पदुआ तथा मिलान में विश्वविद्यालय
स्थापित किए गए। नए ज्ञान और नए विचारों के विकास में इन विश्वविद्यालयों ने
महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी ज्ञान और इन्हीं विचारों ने नव-जागरण तथा नए यूरोप
के उदय का मार्ग प्रशस्त किया।
सामंतवाद का उदय
रोम साम्राज्य को विघटन के बाद पश्चिमी यूरोप में, एक नए प्रकार के समाज और नई
शासन-व्यवस्था का उदय हुआ। इसे नवोदित व्यवस्था को फ्यूडलिज्म या सामंतवाद कहते
हैं। ‘‘ फ्यूडलिज्म’’ शब्द लैटिन शब्द ‘फ्यूडम’ से उत्पन्न है। ‘‘ फ्यूडम’ का अर्थ
है ‘‘फीफ’ֈ या ‘‘जागीर’’ इस समाज में सबसे शक्तिशाली वे सरदार
थे जो अपनी सैनिकः शक्ति के बल पर बहुत बड़े भू-क्षेत्रों पर हावी थे और जिनकी
शासन में भी महत्वपूर्ण भूमिका रहती थीं। राजा एक अधिक शक्तिशाली सामंत करदार से
अधिक कुछ नहीं होता था। कालांतर में राजा अधिक शक्तिशाली हो गया और उसने
सरंक्षदायें की सत्ता क्लो लुगाम देने की कोशिश की। इसका तरीका यह था कि राजा
सरदारों को अपने मातहतोंֺ’’ (वसेल्स) के रूप में अपने प्रति वफादारी की शपथ
दिलाता था और बदले में वह यह मान लेता था कि उन सरदारों के प्रभाद वाले इलाके उनकी
‘जागीर’ हैं। उधर सरदार अपने मातहतों के तौर पर उप-सरदार नियुक्त कर सकते थे और
अपनी जागीर का कुछ हिस्सा उन्हें दर-जागीर के तौर पर बख्श सकते थे। सिद्धांततः
राजा गैर-वफादार संरदारों की जागीरें छीन सकता था लेकिन व्यवहार में शायद ही ऐसा
कभी हुआ हो। इस प्रकार सामंती व्यवस्था में सरकार में भूस्वामी अभिजात वर्ग को
बोलबाला रहता था। इस वर्ग की स्थिति वंशानुगत थी और बह भरसक कोशिश करता था कि उसके
समूह में बाहर के लोगों का प्रवेश न हो। ध्यान देने योग्य है कि यह ऐसा अभिजात
वर्ग नहीं होता था जिसका द्वार दूसरों के लिए पूरी तरह बंद रहता हो। मोटे तौर पर
चही सामंती व्यवस्था थी। मध्य एशिया में तुर्की और भारत में राजपूतों ने जो समाज
और शासन-व्यवस्था विकसित की उसका भारत और बाहरी दुनिया इस व्यवस्था से कई दृष्टियों से काफी साम्य था। अपने विकास
के क्रम में इस व्यवस्था ने विभिन्न देशों की अवस्थाओं और परंपराओं के अनुसार
उनमें अलग-अलग रूप धारण किया। यूरोप में सामंती व्यवस्था की दो और विशेषताएँ बताई
जाती हैं। एक तो है कृषि-दासत्व (सर्फडम) की प्रथा। कृषि-दास भूमि को कोड़ने-कमाने
का काम करता था और उसे न तो अपना पेशा बदलने की छूट रहती थी और न कहीं अन्यत्र जा
कर बसने की सुविधा थी। वह अपने प्रभु (लार्ड) की इजाज़त के बिना शादी भी नहीं कर
सकता था। इसी से जुड़ी हुई थी ‘मेनर’ की व्यवस्था। मेनर वह इमारत या दुर्ग होता था
जहाँ लार्ड रहता था । कई यूरोपीय देशों में इन मेनरों के लार्ड बड़े-बड़े
भू-क्षेत्रों के स्वामी होते थे। इस भूमि के एक हिस्से पर कृषि-दासों, की सहायता
से लार्ड खुद खेती करता था। कृषि-दासों को कुछ समय लार्ड की ज़मीन पर काम करना
पड़ता था और बाकी समय वे खुद अपने खेतों में काम करते थे। चूंकि सिद्धांततः ज़मीन
का मालिक लार्ड होता था, इसलिए कृषि-दास को उसे नकद और जिस के दूसरी किस्मों के भी
कर-नज़राने देने पड़ते थे। मेनर का लार्ड शांति-सुव्यवस्था कायम रखने और न्याय
करने आदि के लिए भी जिम्मेदार होता था। चूंकि उन दिनों काफी अव्यवस्था फैली हुई
थी, इसलिए कभी-कभी स्वतंत्र किसान भी संरक्षण के बदले मेनर के लार्ड पातहती स्वीकार
करने को तैयार हो जाते थे। कु इतिहासकारों का विचार है कि कृषिदासत्व और मेनर
प्रणाली सामंतवाद की अनिवार्य विशेषताएँ हैं और जिन समाजों में ये दो विशेषताएँ
दिखाई नहीं देती है उन्हें सामंती कहना गलत है। उदाहरण के लिए भारत में सच्चे
अर्थों में न ता कृषिदासत्वः था और न मेनर प्रणाली लेकिन स्थानीय भूस्वामियों और
सामंतों को वैसे बहुत-से अधिकार प्राप्त थे। जैसे कि फ्यूडल लाड़ को हासिल हुआ
करते थे, और किसान इन्हीं लोगों पर आश्रित रहा करते थे। दूसरे शब्दों में, महत्व
की बात यह नहीं थीं कि किसान विधिवत् स्वतंत्र थे या नहीं, बल्कि यह थी कि वे किस
प्रकार से और किस हद तक इस स्वतंत्रता का उपयोग और उपभोग कर सकते थे। यूरोप के कई
देशों में मेनर प्रणाली और कर-नज़रानों के तौर पर श्रम-सेवा देने की प्रथा चौदहवीं
सदी के बाद समाप्त हो गई। यूरोप की सामंती व्यवस्था की दूसरी विशेषताको संबंध
सैनिक संगठन की प्रणाली से है। सामंती व्यवस्था का सबसे ज्वलंत प्रतीक घोड़े पर
सवार वीर योद्धा (नाइट) था। वस्तुतः यूरोप में अश्वरोही युद्ध के मूल की तलाश
आठवीं सदी से अधिक पीछे नहीं जाती। रोम साम्राज्य के काल में सरदारों के नेतृत्व
में लड़ने वाली वाहिनियों में भारी और हल्की सैनिक टुकडियाँ हुआ करती थीं जो लंबे
भालों और छोटी तलवारों से लैस होती थीं। घोडों का इस्तेमाल रथ खींचने के लिए किया
जाता था और रथों की सवारी अधिकारी वर्ग के लोग करते थे। आमतौर पर माना जाता है कि
अरबों के आगमन के साथ युद्ध का तरीका वदल गया। अरबों के पास घोड़ो की कोई कमी नहीं
थी। इन् घोड़ो की तीव्र गति तथा उन पर सवार धनुर्धारियों के कारण पैदल सेना बेकार
हो गई। नई युद्ध-पद्धति के लिए आवश्यक संगठन के विकास और अनुरक्षण से संबंधित
समस्याओं से यूरोप में सामंतवाद की अभिवृधि में कहायता मिली। कोई भी राजा अपने
संसाधनों के बल पर विशाल अश्वरोही सेनी नहीं रख सकता था और उसके लिए आवश्यक
हथियार-बख्तर तथा साज-सज्जा नहीं जुटा सकता था। इसलिए सेना का विकेंद्रीकरण कर
दिया गया। जागीरदारों पर उनकी अपनी-अपनी हैसियत के मुताबिक यह जिम्मेदारी डाल दी
गई कि वे राजा की सेवा के लिए एक निश्चित संख्या में अश्वरोही और पैदल सेनाएँ
रखें। दो आविष्कारों के कारण अश्वरोही युद्ध लड़ाई का प्रमुख तरीका बन गया। यद्यपि
ये दोनों आविष्कार काफी पुराने थे तथापि इनका व्यापक उपयोग इसी काल में आरंभ हुआ।
पहला तो था लोहे की रकाब का आविष्कार इस रकाब के कारण हथियारों और कवच से भली
भाँति सज्जित सैनिक को घोड़े की पीठ से गिरने का भय नहीं रहता था। इसके अलावा रकाब
में पैर फँसाए। सैनिक भाले को ठीक से सँभाले रख कर तेजी से हमला कर सकता था और
घोड़े को चाहे जितना दौड़ाया जाए, उसके गिरने कर डर नहीं रहता था। इससे पहले या तो
लकड़ी की रकाब का इस्तेमाल किया जाता था या रस्सी का, जिसमें सिर्फ पैरों के पंजे
फँसाए जा सकते थे। इसलिए अब पैदल सेना के लिए अश्वरोही सेना के हमले का सामना करना
असंभव हो गया था। दूसर थ् एक नए किस्म के साज का आविष्कार। इस साज़ के सहारे घोड़ा
दुहरा वज़न ढो सकता था। ऐसा माना जाता है कि ये दोनों आविष्कार यूरोप में पूर्वी
दुनिया से, शायद पूर्वी एशिया से पहुँचे और भारत में उनका प्रयोग दसवीं सदी से
शुरू हुआ। इस प्रकार राजनीतिक, आर्थिक और सैनिक-कई कारणों से यूरोप में सामंतवाद
का विकास हुआ। जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था।
लेकिन कुछ मठों ने बहुत अधिक
संपत्ति अर्जित करके फ्यूडल लॅ की तरह व्यवहार करना शुरू कर दिया। इससे आंतरिक कलह
की स्थिति पैदा हुई और शासकों के साथ उनका संघर्ष आरंभ हो गया क्योंकि शासकों को
गिरजा संगठन तथा पोप की दुनिया की सत्ता से चिढ़ होती थीं। आगे के एक अध्याय में
हम देखेंगे कि यूरोप में गिरजा संगठन और राज्य के बीज के संघर्षों ने किस प्रकार
यूरोप के बाहर के घटनाचक्र को भी प्रभावित किया।



