क्रिया (भाग-4)

क्रिया


परिभाषा- जिस शब्द अथवा शब्द समूह के द्वारा किसी कार्य के होने अथवा करने का बोध हो, वह क्रिया कहलाता है। दूसरे शब्दो में – वाक्य में जिस शब्द से किसी कार्य का करना या होना पाया जाए, उसे क्रिया कहते हैं। जैसे- आना, जाना, खाना, पीना, सोना आदि ।

क्रिया के भेद- सामान्यतः क्रियाएँ दो प्रकार की होती हैं-

(क) अकर्मक क्रिया        (ख) सकर्मक क्रिया

(क) अकर्मक क्रिया-अकर्मक क्रिया का कोई कर्म नहीं होता। अर्थात् ये कर्म रहित क्रियाएँ हैं। इनका कर्म सम्भव ही नहीं । जैसे राधा हँसी।

(ख)  सकर्मक क्रिया- जो क्रिया कर्म के साथ आती है, सकर्मक क्रिया कहलाती है। जैसे- श्याम ने रोटी खायी, सोहन ने खाना खाया,

क्रिया के अन्य भेद- क्रिया के कुछ अन्य भेद इस प्रकार हैं-

(अ) द्विकर्मक क्रिया- अधिकांश वाक्यों में केवल एक कर्म होता है

जैसे- राम ने रोटी खायी।, गीता स्कूल गयी।

           कुछ वाक्यों में द्वि कर्म वाली क्रिया होती है।

           जैसे- मैं लड़के को अंग्रेजी पढ़ाता हूँ।

(ब) संयुक्त क्रिया- जो क्रिया दो या दो से अधिक धातुओं के मेल से बनती है, उसे संयुक्त क्रिया कहते हैं। जैसे- वह रोने लगा।          राम घर पहुँच गया।

                   वह उठ बैठा।               मैं बिस्तर पर लेट गया।

     उपर्युक्त सभी वाक्यों की क्रिया दो धातुओं के मेल से बनी है अर्थात् दो क्रियाओं के संयोग से निर्मित है अतः इन वाक्यों में संयुक्त क्रिया का प्रयोग हुआ है। संयुक्त क्रिया में पहला क्रिया पद प्रधान होता है और दूसर क्रिया पद पहले क्रिया पद को विशिष्टता प्रदान करता हैं। जैसे- वह पढ़ सकता है।

(ग) सहायक क्रिया- मुख्य क्रिया के अर्थ को स्पष्ट करने या उसे पूर्णता प्रदान करने में जो क्रिया पद सहायक बनते हैं उन्हें सहायक क्रिया कहा जाता है। अंग्रेजी में is, are, am वर्तमान काल की सहायक क्रियाएँ हैं तो हिन्दी में है, हो, हूँ वर्तमान काल की सहायक क्रियाएँ हैं।

जैसे- वह जा रहा है।          मैं खा रहा था।

               वह जाता है।            वे सुनते थे।

(घ)    पूर्वकालिक क्रिया- जब कोई कर्ता एक क्रिया समाप्त कर उसी क्षण दूसरी क्रिया में लग जाता है तब पहली क्रिया को पूर्वकालिक क्रिया कहा जाता है।

जैसे- वह नहाकर चला गया।

      पवन नहाकर चला गया।

      मैं नहाकर भोजन करता हूँ।

(ङ)    नामबोधक क्रिया- जब कोई क्रिया संज्ञा अथवा विशेषण शब्द को क्रिया के साथ जोड़ने से बनती है तो उसे नामबोधक क्रिया कहा जाता है।

जैसे-  शंकर जी ने उसे भस्म किया।

      वह निराश हुआ।

(नामबोधक क्रियाएँ संयुक्त क्रियाएँ नहीं हैं क्योंकि संयुक्त क्रिया दो क्रियाओं के योग से बनती है, जबकि नामबोधक क्रिया में पहला पद विशेषण या संज्ञा होना और दूसरा पद क्रिया होता है।)

(च)   क्रियार्थक संज्ञा- जब किसी वाक्य की क्रिया संज्ञा की भाँति व्यवहार करती है तब उसे क्रियार्थक संज्ञा कहा जाता है। 

                    जैसे- नहाना स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद है।

  टहलना रक्तचाप को नियंत्रण में रखता है।

  देश के लिए मरना कीर्तिदायक है।

क्रिया का काल- क्रिया के जिस रूप से कार्य व्यापार के समय का बोध होता है, उसे काल कहते है। सामान्यतः क्रिया के तीन काल माने जाते हैं- (क) भूतकाल,    (ख) वर्तमानकाल (ग) भविष्यकाल

(क) भूतकाल- भूतकाल से कार्य की समाप्ति का बोध होता है। क्रिया का वह रूप जो यह बताता है कि कार्य समाप्त हो चुका है, भूतकाल कहा जाता है।

भूतकाल के छः भेद हैं-

(1)    सामान्य भूत- इसमें क्रिया के विशेष समय का ज्ञान नहीं होता ।

जैसे- राम आया। , सीता गयी।, किसने खाया।

(2)    आसन्न भूत- आसन्न भूत से यह प्रकट होता है कि क्रिया की समाप्ति निकट भूत में या तत्काल ही हुई है।

जैसे- मैंने खाना खाया है।

    तुमने पुस्तक पढ़ी है।

(3)    पूर्णभूत- क्रिया के उस रूप को पूर्णभूत कहा जाता है जिसमे क्रिया की समाप्ति के समय का स्पष्ट बोध होता है। इसमें पता चलता है कि क्रिया को समाप्त हुए काफी समय बीत चुका है।

जैसे- मोहन घर गया था।

    उसने सोहन को मारा था।

   वह पहले यहाँ आया था।

(4)    अपूर्णभूत- क्रिया के इस रूप से यह पता चलता है कि क्रिया भूतकाल में सम्पन्न हो रही थीं, किन्तु उसकी समाप्ति का पता नहीं चलता ।

जैसे- श्याम खा रहा था।

    सीमा गा रही थी।

    विवेक पढ़ रहा था

    लक्ष्मी सो रही थी।

(5)    संदिग्ध भूत- संदिग्ध भूतकाल में यह संदेह बना रहता है कि भूतकाल में कार्य पूरा हुआ या नहीं। जैसे – उसने रूपया जमा कर दिया होगा।

 कृष्ण ने गीत गाया होगा।

 सुरेश ने काम कर लिया होगा।

(नोटः- इसमें वाक्य के अन्त में ‘गा’ होता है जो भविष्यकाल का नहीं भूतकाल का बोधक होता है।)

(6)    हेतुहेतुमद् भूत- यदि क्रिया भूतकाल में होने वाली थी पर किसी कारण से न हो सकी हो तो उसे हेतुहेतुमद् भूत कहा जाता है।

जैसे- मैं आपको फोन करती।

    बरात में वे सब आते।

    तुम फल अवश्य खाते।

(ख)वर्तमान काल- क्रियाओं के व्यापार की निरन्तरता को वर्तमान काल कहा जाता है।

जैसे- वह जाता है।

     वह जा रहा है।

      वर्तमान काल के पाँच भेद होते है-

(1)    सामान्य वर्तमान- क्रिया का वर्तमान काल में होना बताया गया है।

जैसे- वह आता है।

(2)    तात्कालिक वर्तमान- क्रिया वर्तमान काल में हो रही है।

जैसे- वह आ रहा है।

(3)    पूर्ण वर्तमान- क्रिया वर्तमान काल में पूर्ण हुई है।

जैसे- वह आया है।

(4)    संदिग्ध वर्तमान- वर्तमान काल में काम पूरा होने की संभावना प्रकट की गई है।

जैसे- वह आया होगा।

(5)    संभाव्य वर्तमान- वर्तमान काल में काम पूरा होने की संभावना प्रकट की गई है।

जैसे- वह आया हो।

(ग)  भविष्यत् काल- भविष्यत में होने वाली क्रिया को भविष्यत काल कहा जाता है। इसके तीन भेद हैं-

(1)    सामान्य भविष्यत्- क्रिया भविष्य में होगी, यह प्रकट होती है।

जैसे- मैं खेलूँगा।

(2)    संभाव्य भविष्यत्- भविष्य में किसी कार्य के होने की सम्भावना हो।

जैसे- सम्भव हैं, मैं खेलूँ।

(3)    हेतुहेतुमद् भविष्यत- एक क्रिया का होना दूसरी क्रिया पर निर्भर करता है।

जैसे- आप आएँ, तो मैं जाऊँ।

                           वाच्य

क्रिया का वह रूपान्तरण जिसमे यह पता चलता है कि वाक्य में इनमें से किसकी प्रधानता है- कर्ता की, कर्म की , एवं भाव की, वाच्य कहा जाता है।

वाच्य तीन प्रकार के होते हैं-

(क) कर्तृवाच्य- इसमें कर्ता की प्रधानता होती है

जैसे- गीता गाती है।

     सुमन ने दूध पिया।

     तुम विद्यालय गए।

(ख)कर्मवाच्य- ऐसे वाक्यों में कर्म को प्रधानता होती है। वह कर्म किसने किया है, इसकी नहीं।

जैसे- अखबार पढ़ा गया।

      पत्र लिखा गया।

      सीता गाया गया।

      नाश्ता किया गया।

(ग)  भाववाच्य- ऐसे वाक्यों में कर्ता और कर्म के स्थान पर भाव की प्रधानता होती है। भाव यहाँ (क्रिया का) बोधक होता है।

जैसे- मुझसे दौड़ा नहीं जाता।

     उससे चुप नहीं रहा जाता।

      (नोटः- किसी वाक्य की क्रिया कर्ता, कर्म या भाव में से किसका अनुसरण कर रही है अर्थात् क्रिया कर्तानुसारी है या कर्मानुसारी है या भाव के अनुसार है, इसे ध्यान में रखकर तीन प्रकार के प्रयोग किए गया है-

(क) कर्तरि – जब क्रिया के लिंग, वचन, पुरूष कर्ता का अनुसरण करते हैं तो उसे कर्तरि प्रयोग कहा जाता है। जैसे- मोहन पुस्तक पढ़ता है।

राधा गीत गाती है।

(ख)कर्मणि – ऐसे वाक्यों की क्रिया के लिंग, वचन, पुरूष कर्म के अनुसार होते हैं।

जैसे- श्याम ने पुस्तक पढ़ी।

    पिंकी ने गीत गाया।

(ग)  भावे -  ऐसे वाक्यों की क्रिया सदैव एकवचन, पुल्लिंग एवं अन्य पुरूष में होता है, वह कर्ता अथवा कर्म का अनुसरण नहीं करता।

जैसे- कबीर से चला नहीं जाता।

    दिलावर से बैठा नहीं जाता।

    लड़कों से रोया नहीं जाता।

अशुद्ध वाक्य                                      शुद्ध वाक्य

वह माला गूँध रही थी।                               वह माला गूँथ रही थी।

रीमा ने आटा गूँथा।                                 रीमा ने आटा गूँथा।

उसे दौरा आता है।                                  उसे दौरा पड़ता है।

सपना ने गाना गाया।                               सपना ने गीत गाया।

उस पर अभियोग चलाया गया।                       उस पर अभियोग लगाया गया है।

वह रोज शराब छानता है।                            वह रोज शराब पीता है।

वह प्रतिदिन भाँग पीता है।                            वह प्रतिदिन भाँग छानता है।

अब आप प्रश्न पूछिए।                                अब आप प्रश्न कीजिए।

मैं आपको धन्यवाद देता हूँ।                           मैं आपका धन्यवाद करता हूँ।

 


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