भारतीय राजतंत्र
Indian Polity
भाग-1 ( Part 1)
भारत में संवैधानिक विकास ( Constitutional Development In India)
1773 का रेग्यूलेटिंग एक्ट ( Regulating Rule Act 1773)
इस एक्ट के द्वारा पहली बार ब्रिटिश मंत्रिमंडल को भारतीय मामलों में विनियमंन का अधिकार दिया गया।
इसमें भारत में संसदीय नियंत्रण का यह पहला प्रयास था।
इस एक्ट के द्वारा बंगाल के गर्वनर जनरल नियुक्त किया गया।
मद्रास तथा बम्बई प्रेसीडेन्सी को बंगाल प्रेसीडेन्सी के अधीन कर दिया गया। तथा बंगाल के गर्वनर को तीनों प्रेसीडेन्सियों का गर्वनर जनरल बना दिया गया।
वारेंन हेस्टिंग्स बंगाल के प्रथम गर्वनर जनरल बने। (अर्थात भारत में प्रथम गर्वनर जनरल)
इस एक्ट के माध्यम से कलकत्ता में सुप्रीम कोर्ट की स्थापना (1774) हुई जिसमें एक मुख्य न्यायाधीश (एलिजा इम्पे) के अतिरिक्त 3 अन्य न्यायाधीश थे।
सुप्रीम कोर्ट को सिविल, आपराधिक, नौसेना, तथा धार्मिक मामलों में अधिकारिता प्राप्त थी।
इस अधिनियम के द्वारा शासन की दोहरी प्रणाली, एक कंपनी तथा दूसरी संसदीय बोर्ड, द्वारा बना दी गई और इस एक्ट के माध्यम से ब्रिटिश सरकार का कंपनी के मामलों तथा इसके भारतीय प्रशासन पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो गया।
2. व्यापारिक - कम्पनी के निदेशक मण्डल द्वारा
व्यापार को छोड़कर सभी मामले (सैन्य, असैन्य एवं राजस्व) बोर्ड आॅफ कंट्रोल (नियंत्रण बोर्ड) के अधीन कर दिये गये।
कर्मचारियों को उपहार लेने पर रोक लगा दिया गया।
इस एक्ट के अन्तर्गत भारत के प्रशासन पर गर्वनर जनरल तथा 3 सदस्यों वाली कौंसिल का नियंत्रण स्थापित हो गया। तथा गर्वनर जनरल को ब्रिटिश क्राउन के प्रति उत्तरदायी बना दिया गया।
भारत में नियुक्त अंग्रेज अधिकारियों के ऊपर मुकदमा चलाने के लिए इंग्लैण्ड में एक कोर्ट की स्थापना की गई।
सभी कानूनों एवं विनियमों की व्याख्या का अधिकार न्यायलयों को दे दिया गया।
इसके अन्र्तगत गर्वनर जनरल का अपनी कार्यकारी परिषद के निर्णय को वीटों करने का अधिकार दे दिया गया।
बोर्ड ऑफ कंट्रोल के अधिकारियों का वेतन भारतीय कोष से मिलने लगा।
कम्पनी के व्यापारिक अधिकारों को ( राजस्व नियंत्रण) 20 वर्ष के लिए बढ़ा दिया गया।
धर्म विभाग की स्थापना कर ईसाई मिशनरियों को धर्म प्रचार की अनुमति प्रदान कर दी।
इस एक्ट में भारतीयों की शिक्षा पर 1 लाख रुपये की वार्षिक बजट निर्धारित किया गया।
स्थानीय स्वायत्तशासी संस्था को करारोपण का अधिकार दिया गया
इसके अन्र्तगत बंगाल के गर्वनर जनरल को पूरे भारत का गर्वनर जनरल बना दिया गया।
लार्ड विलियम बैंटिग को भारत का प्रथम गर्वनर जनरल बना दिया था। इसके बाद सम्पूर्ण भारत पर ब्रिटिश का कब्ज हो गया ।
इसके अन्र्तगत बनाये गये पहले कानूनों का नियामक कानून कहा गया और बाद में बनाये गये कानून को एक्ट या अधिनियम कहा गया।
कम्पनी का चाय और चीन के साथ व्यापारिक एकाधिकार का पूर्णतः समाप्त कर दिया गया।
गर्वनर जनरल और उसकी मंत्रिपरिषद को सम्पूर्ण भारत के लिए कानून बनाने का अधिकार दे दिया गया।
गर्वनर जनरल की परिषद में नियुक्त होने वाला पहला विधि सदस्य लार्ड मैकाले था।
भारत में सभी प्रचलित रूढ़ियों तथा प्रथाओं को संहिता बद्ध करने के लिए एक विधि आयोग का गठन किया गया। इस आयोग के प्रथम अध्यक्ष लार्ड मैकाले थे।
इस एक्ट के माध्यम से नियुक्ति के संबंध में योग्यता को महत्व दिया जाने लगा।
भारत में दास प्रथा को गैर कानूनी घोषित किया गया जिसके आधार पर 1843 में दास प्रथा का उन्मूलन कर दिया गया।
1 - इसने पहली बार गर्वनर जनरल की परिषद के विधायी एवं प्रशानिक कार्यो को अलग कर दिया।
2 - इसने सिविल परीक्षा के चयन हेतु खुली प्रतियोगिता व्यवस्था का शुभारंभ किया। इस प्रकार विशिष्ट सिविल सेवा परीक्षा भारतीयों के लिए खोल दी गयी।
3 - 1854 में भारतीय सिविल सेवा के संबंध में मैकाले समिति की नियुक्ति की गई थी।
4 - इस अधिनियम द्वारा गर्वनर जनरल की परिषद के विधायिका और प्रशासनिक कार्यों को अलग कर दिया गया। जिसके तहत भारत में पृथक भारतीय विधान-परिषद का गठन हुआ। जिसका मुख्य कार्य देश के लिए विधि बनाना था।
5 -भारतीय केन्द्रीय विधान-परिषद में क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का समावेश किया गया।
1853 के अधिनियम ने सर्वप्रथम सम्पूर्ण भारत के लिए एक विधान-मण्डल की स्थापना की गयी।
इसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम या सिपाही विद्रोह भी कहा गया।
भारत को अच्छा बनाने वाला अधिनियम के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
विशेषताऐं-
इसके द्वारा कम्पनी के शासन का अंत कर दिया गया।
1858 में ब्रिटिश संसद द्वारा पारित कानून के तहत भारत पर शासन करने का अधिकार ईस्ट इंडिया कंपनी से लेकर ब्रिटिश क्राउन को दे दिया गया।
इसके अन्र्तगत गर्वनर जनरल का नाम बदलकर भारत का वायसराय कर दिया गया।
लार्ड कैंनिग भारत का प्रथम वायसराय बना दिया गया था।
बोर्ड ऑफ डाइरेक्टर्स तथा बोर्ड ऑफ कन्ट्रोल को समाप्त कर दिया गया।
भारत के प्रशासन का भार अब ब्रिटिश सरकार के मंत्री को भारत का राज्य सचिव बना दिया गया था। जो ब्रिटिश कैबिनेट का सदस्य था तथा ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी था।
इसकी सहायता के लिए 15 सदस्यीय परिषद का गठन किया गया। इसके अध्यक्ष को भारत का सचिव बनाया गया।
इस कानून का प्रमुख उद्देश्य प्रशासनिक मशीनरी में सुधार करना था।
जिससे इंग्लैण्ड से भारत का अधिक्षण और उसका नियंत्रण किया जा सके।
अतः इस अधिनियम से भारत की शासन प्रणाली में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया।
इसके द्वारा कानून बनाने को प्रक्रिया में भारतीय प्रतिनिधियों को शामिल करने की शुरुआत हुयी ।
1861 में लार्ड कैनिंग ने तीन भारतीय बनारस के राजा, महाराजा पटियाला और सर दिनकर राव के विधान परिषद् में मनोनीत किया गया।
इस एक्ट के द्वारा मद्रास और बम्बई प्रेसिडेंसी की शक्तियों विकेन्द्ररीकरण की शुरुआत की।
बंगाल, उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत और पंजाब में 1862,1866 और 1897 में विधानपरिषद स्थापित की गयी।
1859 में लार्ड कैनिंग के द्वारा विभागीय प्रणाली ;च्वतजविसपव ैलेजमउद्ध को मान्यता दी गयी।
इसके अन्र्तगत वायसराय को 6 माह के लिए अध्यादेश जारी करने का अधिकार दिया गया।
केन्द्रीय और प्रान्तीय परिषद् के दो तिहाई सदस्यों को एक सीमित और परोक्ष रूप से चुनाव का प्रावधान किया गया जिसे निकायों की सिफारिश पर की जाने वाली नामांकन की प्रक्रिया कहा गया।
इस एक्ट के द्वारा पहली बार अप्रत्यक्ष निर्वाचन पद्धति का प्रारम्भ किया गया।
इसमंे शमिल भारतीय सदस्यों को वार्षिक बजट पर बहस करने को तथा सरकार से प्रश्न पूछने का अधिकार दिया गया, किंतु इन सदस्यों को अनुपूरक प्रश्न पूछने का अधिकार प्राप्त नहीं था।
इसके अन्र्तगत कुछ सदस्यों को नगरपालिका का , जिला पंचायत, विश्वविघालय का तथा व्यापर मण्डल द्वारा चुना जाने लगा।
इस अधिनियम में केंद्रीय और प्रान्तीय विधान परिषदों दोनों में गैर-सरकारी सदस्यों की नियुक्ति के लिए एक सीमित और परोक्ष रूप से चुनाव का प्रावधान किया जबकि चुनाव शब्द का अधिनियम में कहीं प्रयोग नहीं हुआ है
उस समय लार्ड मार्ले इंग्लैण्ड में भारत राज्य के सचिव थे। और लार्ड मिंटो भारत के वायसराय थे।
इसमें केन्द्रीय और प्रान्तीय विधान परिषद में सदस्यों की संख्या में वृद्धि की गयी जो पहले 16 थी बाद में 60 कर दी गयी।
विधान परिषद सदस्यों को मत विभाजन का अधिकार दिया गया।
इस एक्ट के द्वारा पृथक निर्वाचन प्रणाली लागू की गयी, जिसके अन्र्तगत विधान परिषद की कुछ सीटे मुस्लिमों, सिक्खों, जमींदारों आदि के लिए आरक्षित की गयी।
विधान परिषदो के कार्यो में वृद्धि की गयी और किसी भी विषय पर प्रश्न या अनुपूरक प्रश्प पूछने का अधिकार दिया गया बजट पर संकल्प रखा गया।
कुछ हद तक भारत में संसदीय व्यवस्था का प्रचलन प्रारम्भ हुआ।
वायसराय की कार्यपालिका परिषद का प्रथम भारतीय सदस्य सत्येन्द्र प्रसाद सिंह को नियुक्ति किया गया।
लार्ड मिंटो को सांप्रदायिक निर्वाचन का जनक कहा गया।
मुस्लिम लीग की स्थापना 1906 में हुई थी।
1919 में भारत शासन अधिनियम बनाया गया, जो 1921 में लागू हुआ । इस कानून का मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार भी कहा गया।
इस एक्ट में मांटेग्यू भारत के सचिव और चेम्सफोर्ड भारत के वायसराय थे।
इस एक्ट में पहली बार प्रस्तावना का प्रयोग किया गया तथा इस एक्ट द्वारा उत्तरदायी शासन व्यवस्था का प्रयोग किया गया।
केन्द्र में द्विसदनीय व्यवस्था की स्थापना की गई जिसमें एक राज्य परिषद (उच्च सदन) तथा दूसरा कंेद्रीय विधान सभा (निम्न सदन) के नाम से जाना था।
इस एक्ट के माध्यम से केन्द्र और प्रान्तीय स्तर पर द्वैध शासन प्रणाली में पृथक कर दिया गया-
1 आरक्षित विषय- पुलिस, न्याय, वित्त, सिंचाई, लोक व्यवस्था
2 हस्तांतरित विषय- शिक्षा, खेती, कृषि, स्वास्थय
इसके द्वारा पहली बार संघात्मक व्यवस्था के अंतर्गत शासन के विषयों को केन्द्रसूची एंव राज्यसूची में विभाजित किया गया- केन्द्र सूची- रक्षा, वित्त, विदेश, धर्म, संचार, बैंकिग, आदि।
राज्य सूची- कृषि, शिक्षा, स्वास्थय, पुलिस, लोकव्यवस्था
विधान परिषदो का कार्यकाल 3 वर्ष था तथा अपने क्षेत्राधिकार के अन्र्तगत कानून बनाने व बजट पारित करने का अधिकार था।
अधिनियम के पारित होने के दस वर्ष बाद संवैधानिक सुधारों की चाँच के लिए ब्रिटिश संसद द्वारा एक आयोग का स्थापित किया जाएगा।
इस एक्ट में महिलाओं को मत देने का अधिकार दिया गया। किन्तु परिषदों की सदस्य नहीं बन सकती थी।
1926 में केंद्रीय लोक सेवा आयोग का गठन किया गया।
इसने पहली बार केन्द्र से राज्य के बजट को अलग कर दिया और राज्य को अलग बजट बनाने की स्वीकृति दे दी।
आयोग के सभी सदस्य ब्रिटिश थे तभी सभी दलों ने इसका विरोध किया ।
आयोग ने 1930 को अपनी पहली रिपोर्ट पेश की जिसमे दोहरी शासन प्रणाली, राज्यों का विस्तार, ब्रिटिश भारत में संघ की स्थापना एवं संाप्रदाियक निर्वाचन व्यवस्था जारी रखने की शिफारिश की।
1935 का अधिनियम ब्रिटिश संसद के इतिहास में यह सबसे बड़ा और जटिल अधिनियम माना जाता है।
साइमन आयोग की रिपोर्ट तथा गोलमेज सम्मेलन भारत शासन अधिनियम 1935 के आधार बने।
इस अधिनियम में केन्द्र और राज्यो के बीच तीन सूचियों -
1 संघीय सूची (59 विषय) 2 राज्य सूची (54) 3 समवर्ती सूची (36)
इसने प्रांतों में द्वैध शासन व्यवस्था समाप्त कर दी।
केन्द्र स्तर पर द्वैध शासन प्रणाली स्थापित की। केंद्रीय विधानमंडल में दो सदन थे- संघीय तथा राज्य
इस अधिनियम के द्वारा 6 प्रान्तों- मद्रास, बम्बई, बंगाल, बिहार संयुक्त प्रान्त तथा असम में द्विसदनीय विधान मंडल की स्थापना की।
इस एक्ट के द्वारा दलित जातियों, महिलाओं, और मजदूर वर्ग के लिए अलग से निर्वाचन व्यवस्था की।
इसने मताधिकार का विस्तार किया तथा 10 प्रतिशत जनसंख्या को मत का अधिकार मिल गया।
इस एक्ट के अन्र्तगत देश की मुद्रा और साख पर नियंत्रण रखने के लिए रिजर्व बैंक की स्थापना की गयी।
इसमें न केवल केन्द्र लोक सेवा आयोग की स्थापना की बल्कि प्रांतीय लोक सेवा आयोग या दो या दो अधिक राज्यों के लिए संयुक्त लोक सेवा आयोग की स्थापना की।
इस एक्ट के तहत 1937 (केन्द)्र में सुप्रीम कोर्ट की स्थापना की।
काॅग्रंेस ने इस अधिनियम को निराशाजनक कहकर इसकी निंदा की। जवाहर लाल नेहरू ने इसे ‘ अनेक बैंकों वाला किंतु इंजनरहित गाड़ी’ की संज्ञा दी तथा इसे ‘गुलामी का अधिकार पत्र’ कहा।
1947 में लार्ड माउन्टबेटन को वायसराय नियुक्त किया गया।
3 जून 1947 केा माउंटबेटन की विभाजन योजना कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने स्वीकार कर ली। इस योजना को माउंटबेटन योजना कहा गया।
माउंटबेटन योजना को कानूनी रूप प्रदान करने के लिए 18 जुलाई 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम पेश किया गया।
अधिनियम का दो डोमिनियनों की स्थापना के लिए 15 अगस्त 1947 की तारीख निर्धारित की गयी।
वायसराय का पद समाप्त कर दोनो राष्ट्रों में गर्वनर जनरल का पद घोषित किया।
संविधान सभा को अपने देश का संविधान बनाने और दूसरे देश के संविधान को अपनाने की स्वतंत्रता थी।
15 अगस्त 1947 से 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान के लागू होने तक भारत का राजनीतिक दर्जा ब्रिटिश राष्ट्रकूल का एक औपनिवेशक का रहा।
इस अधिनियम में यह प्रावधान किया गया कि भारत का संविधान लागू होने तक भारत की शासन व्यवस्था 1935 के एक्ट के अनुसार संचालित किया जायेगा।
1 जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रमण्डल सम्बन्ध तथा विदेशी मामले
2 सरदार वल्लभ भाई पटेल गृह, सूचना एवं प्रसारण
3 डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद खाद्य एवं कृषि मंत्रालय
4 जाॅन मथाई उद्योग एवं नागरिक आपूर्ति
5 जगजीवन राम श्रम
6 सरदार बलदेव सिंह रक्षा
7 सी.एच. भाभा कार्य, खान एंव ऊर्जा
8 लियाकत अली खाॅ वित्त
9 अब्दुर-रब-निश्तार डाक एंव वायु
10 आसफ अली रेलवे एवं परिवाहन
11 सी. राजगोपालचारी शिक्षा एंव कला
12 आई.आई. चुंदरीगर वाणिज्य
13 गजनफर अली खान स्वास्थ
14 जोगंेद्र नाथ मंडल विधि
स्वतंत्र भारत का पहला मंत्रिमण्डल 1947
2 सरदार वल्लभ भाई पटेल गृह, सूचना एवं प्रसारण, राज्य के मामले
3 डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद खाद्य एवं कृषि मंत्रालय
4 जाॅन मथाई रेलवे एवं परिवाहन
5 जगजीवन राम श्रम
6 सरदार बलदेव सिंह रक्षा
7 सी.एच. भाभा वाणिज्य
8 मौलाना अबुल कालाम आजाद शिक्षा
9 आर.के षणमुगम शेट्टी वित्त
10 डाॅ. बी. आर. अम्बेडकर विधि
11 वी.एन गडगिल कार्य,खान एवं ऊर्जा
12 रफी अहमद किदवई संचार
13 राजकुमारी अमृत कौर स्वास्थ
14 श्यामा प्रसाद मुखर्जी उद्योग एंव आपूर्ति
1784 का पिट्स इंडिया एक्ट Pits India Act 1784)
ऐक्ट आॅफ सेटलमेंट एक्ट का विस्तृत रूप ही पिट्स इंडिया एक्ट था । ( ऐक्ट आॅफ सेटलमेंट 1781 - यह रेग्युलेटिंग एक्ट की कमी को दूर करने के लिए लागू किया गया था। कलकत्ता सरकार बंगाल, बिहार और उड़ीसा के दीवानी प्रदेशों के लिए विधि बना सकती थी।) इस अधिनियम के द्वारा शासन की दोहरी प्रणाली, एक कंपनी तथा दूसरी संसदीय बोर्ड, द्वारा बना दी गई और इस एक्ट के माध्यम से ब्रिटिश सरकार का कंपनी के मामलों तथा इसके भारतीय प्रशासन पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो गया।
इसके अंतर्गत कम्पनी को दो भागों में बाँटा गया-
1. राजनैतिक - 6 सदस्यीय नियंत्रक मण्डल का गठन2. व्यापारिक - कम्पनी के निदेशक मण्डल द्वारा
व्यापार को छोड़कर सभी मामले (सैन्य, असैन्य एवं राजस्व) बोर्ड आॅफ कंट्रोल (नियंत्रण बोर्ड) के अधीन कर दिये गये।
कर्मचारियों को उपहार लेने पर रोक लगा दिया गया।
इस एक्ट के अन्तर्गत भारत के प्रशासन पर गर्वनर जनरल तथा 3 सदस्यों वाली कौंसिल का नियंत्रण स्थापित हो गया। तथा गर्वनर जनरल को ब्रिटिश क्राउन के प्रति उत्तरदायी बना दिया गया।
भारत में नियुक्त अंग्रेज अधिकारियों के ऊपर मुकदमा चलाने के लिए इंग्लैण्ड में एक कोर्ट की स्थापना की गई।
1793 का राजलेख ( Chartar Act 1793)
इसके अन्र्तगत कम्पनी को East India Company के व्यापारिक अधिकारों को अगले 20 वर्षो के लिए बढ़ा दिया गया था। सभी कानूनों एवं विनियमों की व्याख्या का अधिकार न्यायलयों को दे दिया गया।
इसके अन्र्तगत गर्वनर जनरल का अपनी कार्यकारी परिषद के निर्णय को वीटों करने का अधिकार दे दिया गया।
बोर्ड ऑफ कंट्रोल के अधिकारियों का वेतन भारतीय कोष से मिलने लगा।
1813 का राजलेख ( Chartar Act 1793)
इस एक्ट के अन्र्तगत कम्पनी के भारतीय व्यापारिक एकाधिकार को समाप्त कर दिया गया। और केवल चाय और चीन के साथ व्यापार को छोड़कर तथा अन्य सभी क्षेत्रों से कम्पनी का व्यापारिक अधिकार को समाप्त कर दिया गया। कम्पनी के व्यापारिक अधिकारों को ( राजस्व नियंत्रण) 20 वर्ष के लिए बढ़ा दिया गया।
धर्म विभाग की स्थापना कर ईसाई मिशनरियों को धर्म प्रचार की अनुमति प्रदान कर दी।
इस एक्ट में भारतीयों की शिक्षा पर 1 लाख रुपये की वार्षिक बजट निर्धारित किया गया।
स्थानीय स्वायत्तशासी संस्था को करारोपण का अधिकार दिया गया
1833 का चार्टर एक्ट ( Chartar Act 1833)
ब्रिटिश भारत की के केन्द्रीकरण की दशा में यह निर्णायक कदम था- इसके निम्न विशेषताऐं है इसके अन्र्तगत बंगाल के गर्वनर जनरल को पूरे भारत का गर्वनर जनरल बना दिया गया।
लार्ड विलियम बैंटिग को भारत का प्रथम गर्वनर जनरल बना दिया था। इसके बाद सम्पूर्ण भारत पर ब्रिटिश का कब्ज हो गया ।
इसके अन्र्तगत बनाये गये पहले कानूनों का नियामक कानून कहा गया और बाद में बनाये गये कानून को एक्ट या अधिनियम कहा गया।
कम्पनी का चाय और चीन के साथ व्यापारिक एकाधिकार का पूर्णतः समाप्त कर दिया गया।
गर्वनर जनरल और उसकी मंत्रिपरिषद को सम्पूर्ण भारत के लिए कानून बनाने का अधिकार दे दिया गया।
गर्वनर जनरल की परिषद में नियुक्त होने वाला पहला विधि सदस्य लार्ड मैकाले था।
भारत में सभी प्रचलित रूढ़ियों तथा प्रथाओं को संहिता बद्ध करने के लिए एक विधि आयोग का गठन किया गया। इस आयोग के प्रथम अध्यक्ष लार्ड मैकाले थे।
इस एक्ट के माध्यम से नियुक्ति के संबंध में योग्यता को महत्व दिया जाने लगा।
भारत में दास प्रथा को गैर कानूनी घोषित किया गया जिसके आधार पर 1843 में दास प्रथा का उन्मूलन कर दिया गया।
1853 का चार्टर एक्ट ( Chartar Act 1853
1793 से 1853 के दौरान ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किये गये चार्टर अधिनियमों की शृंखला में अंतिम अधिनियम था। संवैधानिक दृष्टि से यह अधिनियम एक महत्वपूर्ण अधिनियम था अतः कुछ विशेषतायें है जो इस प्रकार है-1 - इसने पहली बार गर्वनर जनरल की परिषद के विधायी एवं प्रशानिक कार्यो को अलग कर दिया।
2 - इसने सिविल परीक्षा के चयन हेतु खुली प्रतियोगिता व्यवस्था का शुभारंभ किया। इस प्रकार विशिष्ट सिविल सेवा परीक्षा भारतीयों के लिए खोल दी गयी।
3 - 1854 में भारतीय सिविल सेवा के संबंध में मैकाले समिति की नियुक्ति की गई थी।
4 - इस अधिनियम द्वारा गर्वनर जनरल की परिषद के विधायिका और प्रशासनिक कार्यों को अलग कर दिया गया। जिसके तहत भारत में पृथक भारतीय विधान-परिषद का गठन हुआ। जिसका मुख्य कार्य देश के लिए विधि बनाना था।
5 -भारतीय केन्द्रीय विधान-परिषद में क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का समावेश किया गया।
1853 के अधिनियम ने सर्वप्रथम सम्पूर्ण भारत के लिए एक विधान-मण्डल की स्थापना की गयी।
Constitutional Development Under Crown Rule
भारत शासन अधिनियम 1858
इस कानून का निर्माण 1857 के विद्रोह के बाद किया गया। इसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम या सिपाही विद्रोह भी कहा गया।
भारत को अच्छा बनाने वाला अधिनियम के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
विशेषताऐं-
इसके द्वारा कम्पनी के शासन का अंत कर दिया गया।
1858 में ब्रिटिश संसद द्वारा पारित कानून के तहत भारत पर शासन करने का अधिकार ईस्ट इंडिया कंपनी से लेकर ब्रिटिश क्राउन को दे दिया गया।
इसके अन्र्तगत गर्वनर जनरल का नाम बदलकर भारत का वायसराय कर दिया गया।
लार्ड कैंनिग भारत का प्रथम वायसराय बना दिया गया था।
बोर्ड ऑफ डाइरेक्टर्स तथा बोर्ड ऑफ कन्ट्रोल को समाप्त कर दिया गया।
भारत के प्रशासन का भार अब ब्रिटिश सरकार के मंत्री को भारत का राज्य सचिव बना दिया गया था। जो ब्रिटिश कैबिनेट का सदस्य था तथा ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी था।
इसकी सहायता के लिए 15 सदस्यीय परिषद का गठन किया गया। इसके अध्यक्ष को भारत का सचिव बनाया गया।
इस कानून का प्रमुख उद्देश्य प्रशासनिक मशीनरी में सुधार करना था।
जिससे इंग्लैण्ड से भारत का अधिक्षण और उसका नियंत्रण किया जा सके।
अतः इस अधिनियम से भारत की शासन प्रणाली में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया।
भारत परिषद अधिनियम 1861
1861 का भारत परिषद अधिनियम संवैधानिक और राजनैतिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण अधिनियम था। इसके द्वारा कानून बनाने को प्रक्रिया में भारतीय प्रतिनिधियों को शामिल करने की शुरुआत हुयी ।
1861 में लार्ड कैनिंग ने तीन भारतीय बनारस के राजा, महाराजा पटियाला और सर दिनकर राव के विधान परिषद् में मनोनीत किया गया।
इस एक्ट के द्वारा मद्रास और बम्बई प्रेसिडेंसी की शक्तियों विकेन्द्ररीकरण की शुरुआत की।
बंगाल, उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत और पंजाब में 1862,1866 और 1897 में विधानपरिषद स्थापित की गयी।
1859 में लार्ड कैनिंग के द्वारा विभागीय प्रणाली ;च्वतजविसपव ैलेजमउद्ध को मान्यता दी गयी।
इसके अन्र्तगत वायसराय को 6 माह के लिए अध्यादेश जारी करने का अधिकार दिया गया।
भारत परिषद अधिनियम 1892
इस एक्ट ने भारत में प्रतिनिधि सरकार की नींव डाली। केन्द्रीय और प्रान्तीय परिषद् के दो तिहाई सदस्यों को एक सीमित और परोक्ष रूप से चुनाव का प्रावधान किया गया जिसे निकायों की सिफारिश पर की जाने वाली नामांकन की प्रक्रिया कहा गया।
इस एक्ट के द्वारा पहली बार अप्रत्यक्ष निर्वाचन पद्धति का प्रारम्भ किया गया।
इसमंे शमिल भारतीय सदस्यों को वार्षिक बजट पर बहस करने को तथा सरकार से प्रश्न पूछने का अधिकार दिया गया, किंतु इन सदस्यों को अनुपूरक प्रश्न पूछने का अधिकार प्राप्त नहीं था।
इसके अन्र्तगत कुछ सदस्यों को नगरपालिका का , जिला पंचायत, विश्वविघालय का तथा व्यापर मण्डल द्वारा चुना जाने लगा।
इस अधिनियम में केंद्रीय और प्रान्तीय विधान परिषदों दोनों में गैर-सरकारी सदस्यों की नियुक्ति के लिए एक सीमित और परोक्ष रूप से चुनाव का प्रावधान किया जबकि चुनाव शब्द का अधिनियम में कहीं प्रयोग नहीं हुआ है
भारत शासन अधिनियम - 1909
इस एक्ट को मार्ले-मिन्टो सुधार के नाम से जाना जाता है। उस समय लार्ड मार्ले इंग्लैण्ड में भारत राज्य के सचिव थे। और लार्ड मिंटो भारत के वायसराय थे।
इसमें केन्द्रीय और प्रान्तीय विधान परिषद में सदस्यों की संख्या में वृद्धि की गयी जो पहले 16 थी बाद में 60 कर दी गयी।
विधान परिषद सदस्यों को मत विभाजन का अधिकार दिया गया।
इस एक्ट के द्वारा पृथक निर्वाचन प्रणाली लागू की गयी, जिसके अन्र्तगत विधान परिषद की कुछ सीटे मुस्लिमों, सिक्खों, जमींदारों आदि के लिए आरक्षित की गयी।
विधान परिषदो के कार्यो में वृद्धि की गयी और किसी भी विषय पर प्रश्न या अनुपूरक प्रश्प पूछने का अधिकार दिया गया बजट पर संकल्प रखा गया।
कुछ हद तक भारत में संसदीय व्यवस्था का प्रचलन प्रारम्भ हुआ।
वायसराय की कार्यपालिका परिषद का प्रथम भारतीय सदस्य सत्येन्द्र प्रसाद सिंह को नियुक्ति किया गया।
लार्ड मिंटो को सांप्रदायिक निर्वाचन का जनक कहा गया।
मुस्लिम लीग की स्थापना 1906 में हुई थी।
1919 का भारत शासन अधिनियम
20 अगस्त 1917 को ब्रिटिश सरकार ने पहली बार यह घोषण की उसका प्रमुख उद्देश्य भारत में उत्तरदायी सरकार की स्थापना करना है। 1919 में भारत शासन अधिनियम बनाया गया, जो 1921 में लागू हुआ । इस कानून का मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार भी कहा गया।
इस एक्ट में मांटेग्यू भारत के सचिव और चेम्सफोर्ड भारत के वायसराय थे।
इस एक्ट में पहली बार प्रस्तावना का प्रयोग किया गया तथा इस एक्ट द्वारा उत्तरदायी शासन व्यवस्था का प्रयोग किया गया।
केन्द्र में द्विसदनीय व्यवस्था की स्थापना की गई जिसमें एक राज्य परिषद (उच्च सदन) तथा दूसरा कंेद्रीय विधान सभा (निम्न सदन) के नाम से जाना था।
इस एक्ट के माध्यम से केन्द्र और प्रान्तीय स्तर पर द्वैध शासन प्रणाली में पृथक कर दिया गया-
1 आरक्षित विषय- पुलिस, न्याय, वित्त, सिंचाई, लोक व्यवस्था
2 हस्तांतरित विषय- शिक्षा, खेती, कृषि, स्वास्थय
इसके द्वारा पहली बार संघात्मक व्यवस्था के अंतर्गत शासन के विषयों को केन्द्रसूची एंव राज्यसूची में विभाजित किया गया- केन्द्र सूची- रक्षा, वित्त, विदेश, धर्म, संचार, बैंकिग, आदि।
राज्य सूची- कृषि, शिक्षा, स्वास्थय, पुलिस, लोकव्यवस्था
विधान परिषदो का कार्यकाल 3 वर्ष था तथा अपने क्षेत्राधिकार के अन्र्तगत कानून बनाने व बजट पारित करने का अधिकार था।
अधिनियम के पारित होने के दस वर्ष बाद संवैधानिक सुधारों की चाँच के लिए ब्रिटिश संसद द्वारा एक आयोग का स्थापित किया जाएगा।
इस एक्ट में महिलाओं को मत देने का अधिकार दिया गया। किन्तु परिषदों की सदस्य नहीं बन सकती थी।
1926 में केंद्रीय लोक सेवा आयोग का गठन किया गया।
इसने पहली बार केन्द्र से राज्य के बजट को अलग कर दिया और राज्य को अलग बजट बनाने की स्वीकृति दे दी।
साइमन आयोग
नवंबर 1927 को ब्रिटिश सरकार ने भारत में नए संविधान की स्थिति का पता लागाने के लिए सर जाॅन साइमन के नेतृत्व मेेें सात सदस्यीय वैधानिक आयोग का गठन किया । (निर्राधारित समय से 2 वर्ष पूर्व) आयोग के सभी सदस्य ब्रिटिश थे तभी सभी दलों ने इसका विरोध किया ।
आयोग ने 1930 को अपनी पहली रिपोर्ट पेश की जिसमे दोहरी शासन प्रणाली, राज्यों का विस्तार, ब्रिटिश भारत में संघ की स्थापना एवं संाप्रदाियक निर्वाचन व्यवस्था जारी रखने की शिफारिश की।
सांप्रदायिक अवार्ड, पूना पैक्ट
अगस्त 1932 में रैम्जै मैक्डोनाल्ड ने अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधितत्व पर एक योजना प्रस्तुत की जिसका गाँधी जी द्वारा विरोध हुआ और कांग्रेस नेताओं और दलित नेता भीमराव अम्बेडकर के बीच एक समझौता हुआ था जिसे पूना पैक्ट कहा गया।भारत शासन अधिनियम 1935
इस अधिनियम से सम्पूर्ण भारत में एक उत्तरदायी सरकार का बनाने के लिए मील का पत्थर साबित हुआ। 1935 का अधिनियम ब्रिटिश संसद के इतिहास में यह सबसे बड़ा और जटिल अधिनियम माना जाता है।
साइमन आयोग की रिपोर्ट तथा गोलमेज सम्मेलन भारत शासन अधिनियम 1935 के आधार बने।
इस अधिनियम में केन्द्र और राज्यो के बीच तीन सूचियों -
1 संघीय सूची (59 विषय) 2 राज्य सूची (54) 3 समवर्ती सूची (36)
इसने प्रांतों में द्वैध शासन व्यवस्था समाप्त कर दी।
केन्द्र स्तर पर द्वैध शासन प्रणाली स्थापित की। केंद्रीय विधानमंडल में दो सदन थे- संघीय तथा राज्य
इस अधिनियम के द्वारा 6 प्रान्तों- मद्रास, बम्बई, बंगाल, बिहार संयुक्त प्रान्त तथा असम में द्विसदनीय विधान मंडल की स्थापना की।
इस एक्ट के द्वारा दलित जातियों, महिलाओं, और मजदूर वर्ग के लिए अलग से निर्वाचन व्यवस्था की।
इसने मताधिकार का विस्तार किया तथा 10 प्रतिशत जनसंख्या को मत का अधिकार मिल गया।
इस एक्ट के अन्र्तगत देश की मुद्रा और साख पर नियंत्रण रखने के लिए रिजर्व बैंक की स्थापना की गयी।
इसमें न केवल केन्द्र लोक सेवा आयोग की स्थापना की बल्कि प्रांतीय लोक सेवा आयोग या दो या दो अधिक राज्यों के लिए संयुक्त लोक सेवा आयोग की स्थापना की।
इस एक्ट के तहत 1937 (केन्द)्र में सुप्रीम कोर्ट की स्थापना की।
काॅग्रंेस ने इस अधिनियम को निराशाजनक कहकर इसकी निंदा की। जवाहर लाल नेहरू ने इसे ‘ अनेक बैंकों वाला किंतु इंजनरहित गाड़ी’ की संज्ञा दी तथा इसे ‘गुलामी का अधिकार पत्र’ कहा।
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947
20 फरवरी 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट इटली ने घोषणा की कि 30 जून, 1947 को भारत में ब्रिटिश शासन समाप्त कर दिया जाएगा। 1947 में लार्ड माउन्टबेटन को वायसराय नियुक्त किया गया।
3 जून 1947 केा माउंटबेटन की विभाजन योजना कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने स्वीकार कर ली। इस योजना को माउंटबेटन योजना कहा गया।
माउंटबेटन योजना को कानूनी रूप प्रदान करने के लिए 18 जुलाई 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम पेश किया गया।
अधिनियम का दो डोमिनियनों की स्थापना के लिए 15 अगस्त 1947 की तारीख निर्धारित की गयी।
वायसराय का पद समाप्त कर दोनो राष्ट्रों में गर्वनर जनरल का पद घोषित किया।
संविधान सभा को अपने देश का संविधान बनाने और दूसरे देश के संविधान को अपनाने की स्वतंत्रता थी।
15 अगस्त 1947 से 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान के लागू होने तक भारत का राजनीतिक दर्जा ब्रिटिश राष्ट्रकूल का एक औपनिवेशक का रहा।
इस अधिनियम में यह प्रावधान किया गया कि भारत का संविधान लागू होने तक भारत की शासन व्यवस्था 1935 के एक्ट के अनुसार संचालित किया जायेगा।
अंतरिम सरकार 1946
क्र. सदस्य निर्धारित विभाग1 जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रमण्डल सम्बन्ध तथा विदेशी मामले
2 सरदार वल्लभ भाई पटेल गृह, सूचना एवं प्रसारण
3 डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद खाद्य एवं कृषि मंत्रालय
4 जाॅन मथाई उद्योग एवं नागरिक आपूर्ति
5 जगजीवन राम श्रम
6 सरदार बलदेव सिंह रक्षा
7 सी.एच. भाभा कार्य, खान एंव ऊर्जा
8 लियाकत अली खाॅ वित्त
9 अब्दुर-रब-निश्तार डाक एंव वायु
10 आसफ अली रेलवे एवं परिवाहन
11 सी. राजगोपालचारी शिक्षा एंव कला
12 आई.आई. चुंदरीगर वाणिज्य
13 गजनफर अली खान स्वास्थ
14 जोगंेद्र नाथ मंडल विधि
स्वतंत्र भारत का पहला मंत्रिमण्डल 1947
क्र. सदस्य निर्धारित विभाग
1 जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री,राष्ट्रमण्डल सम्बन्ध तथा विदेशी मामले, वैज्ञानिक शोध2 सरदार वल्लभ भाई पटेल गृह, सूचना एवं प्रसारण, राज्य के मामले
3 डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद खाद्य एवं कृषि मंत्रालय
4 जाॅन मथाई रेलवे एवं परिवाहन
5 जगजीवन राम श्रम
6 सरदार बलदेव सिंह रक्षा
7 सी.एच. भाभा वाणिज्य
8 मौलाना अबुल कालाम आजाद शिक्षा
9 आर.के षणमुगम शेट्टी वित्त
10 डाॅ. बी. आर. अम्बेडकर विधि
11 वी.एन गडगिल कार्य,खान एवं ऊर्जा
12 रफी अहमद किदवई संचार
13 राजकुमारी अमृत कौर स्वास्थ
14 श्यामा प्रसाद मुखर्जी उद्योग एंव आपूर्ति

